
कवियों, लेखकों का शुभ्रमंच:-विश्व को नौ रस समझा कर, प्रत्येक में मूर्धन्य महाकवियों से समृद्ध भारत में दिनकर के बाद, भांड और भाट, पूछे और पूजे जाने लगे, तब और दिनकर कहाँ से पैदा होंगे? समुन्द्र से गहरा, वासनामुक्त हो-साहित्य.तिलक.(निस्संकोच ब्लॉग पर टिप्पणी/अनुसरण/निशुल्क सदस्यता व yugdarpanh पर इमेल/चैट करें,संपर्कसूत्र https://t.me/ydmstm - तिलक रेलन आज़ाद वरिष्ठ पत्रकार, संपादक युगदर्पण®2001 मीडिया समूह YDMS👑 09971065525, 9911111611, 9911145678.
Monday, May 17, 2010
Monday, May 10, 2010
सोचता था उम्र भर, दीप बनकर जलूँ
बन ज्योति हाथ हाथों में लेकर चलूँ
मगर मुझको भी इस तिमिर ने छला
उजले घर , लेकिन सोच उज्वल कहाँ है
अब तो नज़रों का है धोखा भीड़ भी
भीड़ में भी शख्स अकेला ही खड़ा है
पास रहकर भी रहे हम दूर जैसे
संग सांसों के घुटन का सिलसिला है
काफिले कितने ही कायरों के है यहाँ
दोस्त भी पिछले मोड़ से मुड़ गया है
नींद नहीं ,तकिया कोहनी का लगाकर
डर लुटने का घर मन में कर गया है
सोचता हूँ कुछ धरोहर छोड़ने को लिखूं
"कादर" हर व्यथा जैसे मेरी ही कथा है
केदारनाथ "कादर"
"अंधेरों के जंगल में,दिया मैंने जलाया है !इक दिया,तुम भी जलादो;अँधेरे मिट ही जायेंगे !!" युगदर्पण
बन ज्योति हाथ हाथों में लेकर चलूँ
मगर मुझको भी इस तिमिर ने छला
उजले घर , लेकिन सोच उज्वल कहाँ है
अब तो नज़रों का है धोखा भीड़ भी
भीड़ में भी शख्स अकेला ही खड़ा है
पास रहकर भी रहे हम दूर जैसे
संग सांसों के घुटन का सिलसिला है
काफिले कितने ही कायरों के है यहाँ
दोस्त भी पिछले मोड़ से मुड़ गया है
नींद नहीं ,तकिया कोहनी का लगाकर
डर लुटने का घर मन में कर गया है
सोचता हूँ कुछ धरोहर छोड़ने को लिखूं
"कादर" हर व्यथा जैसे मेरी ही कथा है
केदारनाथ "कादर"
"अंधेरों के जंगल में,दिया मैंने जलाया है !इक दिया,तुम भी जलादो;अँधेरे मिट ही जायेंगे !!" युगदर्पण
और नहीं अब और नहीं
और नहीं अब और नहीं
बूढी आँखों में सपनों की मौतें
गीत रुंधी आवाजों में
और नहीं अब और नहीं
बिंधे पंख से और उड़ानें
मजदूरों के तैश तराने
लहू की प्यासी तेज कटारें
और नहीं अब और नहीं
अंग भंग न करो देश के
न करो प्रेम का बंटवारा
भाई -भाई में रार नई
और नहीं अब और नहीं
जंगखोर कर रहे घोषणा
शांति का तुम कर दो नाद
लहू की धार धरती पर
और नहीं अब और नहीं
हर मन इक उपवन हो जाये
न हो नई कहीं बिभिषिका
दुनिया के नक़्शे पे दरारें
और नहीं अब और नहीं
मुक्त प्राण हो मुक्त हो सांसे
न मन पर कोई बंधन हो
अवांछित शासन की शर्तें
और नहीं अब और नहीं
स्वर सम्बेत सभी जन गाएं
विश्व में गड़बड़ और नहीं
प्रेम राज हो "कादर" कटुता
और नहीं अब और नहीं
केदारनाथ "कादर"
"अंधेरों के जंगल में,दिया मैंने जलाया है !इक दिया,तुम भी जलादो;अँधेरे मिट ही जायेंगे !!" युगदर्पण
बूढी आँखों में सपनों की मौतें
गीत रुंधी आवाजों में
और नहीं अब और नहीं
बिंधे पंख से और उड़ानें
मजदूरों के तैश तराने
लहू की प्यासी तेज कटारें
और नहीं अब और नहीं
अंग भंग न करो देश के
न करो प्रेम का बंटवारा
भाई -भाई में रार नई
और नहीं अब और नहीं
जंगखोर कर रहे घोषणा
शांति का तुम कर दो नाद
लहू की धार धरती पर
और नहीं अब और नहीं
हर मन इक उपवन हो जाये
न हो नई कहीं बिभिषिका
दुनिया के नक़्शे पे दरारें
और नहीं अब और नहीं
मुक्त प्राण हो मुक्त हो सांसे
न मन पर कोई बंधन हो
अवांछित शासन की शर्तें
और नहीं अब और नहीं
स्वर सम्बेत सभी जन गाएं
विश्व में गड़बड़ और नहीं
प्रेम राज हो "कादर" कटुता
और नहीं अब और नहीं
केदारनाथ "कादर"
"अंधेरों के जंगल में,दिया मैंने जलाया है !इक दिया,तुम भी जलादो;अँधेरे मिट ही जायेंगे !!" युगदर्पण
Thursday, May 6, 2010
प्यार में पत्थर मिलेंगे क्या तुम्हे मालूम था
प्यार में पत्थर मिलेंगे क्या तुम्हे मालूम था
दिल लुटाने वाला भी हमसा कोई मासूम था
प्रेम का दरिया बनकर कोई उमड़ा क्या करें
दिल मेरा छोटा प्यार तेरा कहाँ समाएगा
देख आँखों में मेरी सागर तुझे मिल जायेगा
दर्द ही नहीं प्यार में करार भी मिल जायेगा
दर्द सिने का मेरे तुमको जब लगेगा अपना सा
तब इन लफ़्ज़ों का फासला भी फ़ना हो जायेगा
मगरूर न कहना हमें बन्दे खुदा के हम भी हैं
मुहब्बत में "कादर" दिलबर में खुदा मिल जायेगा
केदारनाथ "कादर"
"अंधेरों के जंगल में,दिया मैंने जलाया है !इक दिया,तुम भी जलादो;अँधेरे मिट ही जायेंगे !!" युगदर्पण
दिल लुटाने वाला भी हमसा कोई मासूम था
प्रेम का दरिया बनकर कोई उमड़ा क्या करें
दिल मेरा छोटा प्यार तेरा कहाँ समाएगा
देख आँखों में मेरी सागर तुझे मिल जायेगा
दर्द ही नहीं प्यार में करार भी मिल जायेगा
दर्द सिने का मेरे तुमको जब लगेगा अपना सा
तब इन लफ़्ज़ों का फासला भी फ़ना हो जायेगा
मगरूर न कहना हमें बन्दे खुदा के हम भी हैं
मुहब्बत में "कादर" दिलबर में खुदा मिल जायेगा
केदारनाथ "कादर"
"अंधेरों के जंगल में,दिया मैंने जलाया है !इक दिया,तुम भी जलादो;अँधेरे मिट ही जायेंगे !!" युगदर्पण
Tuesday, May 4, 2010
नेता
चुनाव से भाग्य बदलने की सोच
गरीब आदमी की बेबसी और मूर्खता है
चुनाव महज गुंडा चुनने की कवायद है
जो तय करता है गुंडे का कद और अधिकार
बेइज्जत नेता भी माननीय लगवाता है
नाम के सामने चुनाव जीतने के बाद
चुन कर आने पर उसे हक़ है
हमारी बहन बेटियों की इज्ज़त लूटने
गरीबों का हिस्सा छीनने का
सांड बनकर चढने का निर्वलाओं पर
ये आम आदमी को देते हैं
झूठी तसल्ली के लिए RTI का हक़
और इसकी ही आड़ में करते है
हमारी ही कंवारी इच्छाओं का शीलभंग
केदारनाथ "कादर"
"अंधेरों के जंगल में,दिया मैंने जलाया है !इक दिया,तुम भी जलादो;अँधेरे मिट ही जायेंगे !!" युगदर्पण
गरीब आदमी की बेबसी और मूर्खता है
चुनाव महज गुंडा चुनने की कवायद है
जो तय करता है गुंडे का कद और अधिकार
बेइज्जत नेता भी माननीय लगवाता है
नाम के सामने चुनाव जीतने के बाद
चुन कर आने पर उसे हक़ है
हमारी बहन बेटियों की इज्ज़त लूटने
गरीबों का हिस्सा छीनने का
सांड बनकर चढने का निर्वलाओं पर
ये आम आदमी को देते हैं
झूठी तसल्ली के लिए RTI का हक़
और इसकी ही आड़ में करते है
हमारी ही कंवारी इच्छाओं का शीलभंग
केदारनाथ "कादर"
"अंधेरों के जंगल में,दिया मैंने जलाया है !इक दिया,तुम भी जलादो;अँधेरे मिट ही जायेंगे !!" युगदर्पण
परेशानियाँ
जीवन है तो होंगो ही वो
कहते हैं जिनको परेशानियाँ
चलती रहती हैं साथ वो
बन के जीवन की परछाईयां
ये दोस्त हैं हमारी ही तो
मिलाती हैं एक दूजे से परेशानियाँ
उस खुदा को भी यद् करते तभी
जब वो देता है हमको परेशानियाँ
शुक्रिया शुक्रिया परेशानियों शुक्रिया
तुम्हारी मेहरवानियों ने पता उसका दिया
भूल ही बैठे थे खुद बनकर खुदा
तुमने सिखाया हम हैं क्या ? शुक्रिया
परेशानियाँ ही जोडती है हमें
ये करती हैं हम पर मेहरवानियाँ
याद आया खुदा पाकर तुम्हे
"कादर" परेशानियों को शुक्रिया शुक्रिया
केदारनाथ "कादर"
"अंधेरों के जंगल में,दिया मैंने जलाया है !इक दिया,तुम भी जलादो;अँधेरे मिट ही जायेंगे !!" युगदर्पण
कहते हैं जिनको परेशानियाँ
चलती रहती हैं साथ वो
बन के जीवन की परछाईयां
ये दोस्त हैं हमारी ही तो
मिलाती हैं एक दूजे से परेशानियाँ
उस खुदा को भी यद् करते तभी
जब वो देता है हमको परेशानियाँ
शुक्रिया शुक्रिया परेशानियों शुक्रिया
तुम्हारी मेहरवानियों ने पता उसका दिया
भूल ही बैठे थे खुद बनकर खुदा
तुमने सिखाया हम हैं क्या ? शुक्रिया
परेशानियाँ ही जोडती है हमें
ये करती हैं हम पर मेहरवानियाँ
याद आया खुदा पाकर तुम्हे
"कादर" परेशानियों को शुक्रिया शुक्रिया
केदारनाथ "कादर"
"अंधेरों के जंगल में,दिया मैंने जलाया है !इक दिया,तुम भी जलादो;अँधेरे मिट ही जायेंगे !!" युगदर्पण
Sunday, May 2, 2010
(कविता) -वसीयत
Share
लिख दी है वसीयत मेंने
बेटे बेटी के नाम आज
बढ़ा चढ़ा के क्या लिखूं
अभी तलक का कमाया ही
साफ़ लिख दिया है करीने से
खुद ही सफेद पाठे पर नीली स्याही से
बँटवारा बराबरी का किया है मैंने
लड़ने की बात रखी ना बाकी
बड़े को ब्लॉगर,बेटी को ऑरकुट
पत्नी को फेसबुक थमा दी है
सोचता हूँ छुटके को ट्विटर देदूं,
पता सभी का एक रखा है
बदल बदल कर पासवर्ड बाँट दिया
कर्जे में मकान किराया एक को
दूजे को बिजली की बाकियात मिली है
बेटी को अप्रकाशित उपन्यास हाथ लगा
और पत्नी को कवि सम्मेलनी कवितायें
छोटे पे मेरा दिल कुछ ज्यादा है
दूंगा उसे ही आदतें सारी मेरी अपनी
चाय की थड़ी पर गप्पेबाजी का आलम
जी-टॉक पर बातों का हूनर
और मिस कॉल मारने की मजबूरी
केवल दो उँगलियों से कि-बोर्ड चलाने की आदत
भी उसी के हिस्से लिख दी है
सब कुछ तो लिख दिया है आज
रोजनामचे की तरह खरा-खरा
गाँव में पानी,बस और बिजली का इन्तजार
जानबुझ कर दिया है शहर में रहते बड़े बेटे को
सरकारी ऑफिसों की चक्करबाजी का गणित और
धड़ेबाजी वाला समाजशास्त्र किसे दूं
समझ से परे लगता है इस पीढ़ी को
वसीयत के ख़ास हिस्से को पढ़ने के लिए
होता नहीं कोई तैयार खुदा जाने
जहां लिखा है मेंने बाप के मरणभोज में
बेचे पुस्तेनी मकान का हिसाब अब भी
और लिखा है कम उम्र में मां बनने से
मरी पहले वाली पत्नी की कहानी
सादे कागज़ की किनोरें गीली होने लगी है
वसीयत हाथ से ढ़ीली होने लगी है
दुःख ज्यादा और सम्पति कम लिखी है मैंने
किराए का मकान और मालिक की धमकी
अभी लिखनी बाकी है वसीयत में मेरे
पत्नी को घर छोड़,महिला मित्रों से लम्बी बातें
लिखू कैसे डर लगता है थोड़ा सा
औरों की थाली में ज्यादा नज़र रखने
वाली आँख़ें कौन नेत्र दान में लेगा मेरी
सोच रहा हूँ बैठा-बैठा
पड़ौसियों से किया अदाकारी का व्यवहार
और उधार के पैसों पर बेफिक्री की ज़िंदगी
इसी वसीयत का हिस्सा बना है
तकिये के नीचे कुछ नहीं है अब
तिजोरी की चाबी जैसा
ज़मीन में दबा नहीं रखा कुछ भी खोदने को
मेरे पास तो रही बाकी
ज़िरो बैलेंस वाली संस्कृति
कोयले और चॉक से लिखे नामों सहित ऐतिहासिक इमारतें
लिख दिया है आने वाली पीढ़ी के नाम
प्लास्टिक की थैलियों से अटा पड़ा शहर का तालाब
नदी,नाला,सड़कें और
समारोह में उड़ती फिरती प्लास्टिक की गिलासें
नास्ते के भरोसे आयोजनों में मेरी भागीदारी
और अखबारी खबर में मेरे नाम
वाली कतरनें संभाल रखी है
वसीयत में देने को
लेने को राजी नहीं कोई क्या करें
नास्ते के भरोसे आयोजनों में मेरी भागीदारी
और अखबारी खबर में मेरे नाम
वाली कतरनें संभाल रखी है
वसीयत में देने को
लेने को राजी नहीं कोई क्या करें
कुछ भी बाकी नहीं रखा है
माफ़ करना मेरे अपनों
ज्य़ादा कमा नहीं पाया
लिखने को वसीयत मेरी
वसीयत पूरी होती है
रचना:माणिक
Subscribe to:
Posts (Atom)